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ईरान ने अमेरिका को याद दिलाई अपनी शर्त, क्या अराघची की बातें मान जाएंगे ट्रंप? जानें क्या हैं वो शर्तें

 Edited By: Kajal Kumari @lallkajal
 Published : Jun 13, 2026 07:50 am IST,  Updated : Jun 13, 2026 10:31 am IST

ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव खत्म होने की संभावना नजर आ रही है, दोनों देश युद्ध खत्म करने पर राजी हो गए हैं। ईरान ने अमेरिका को पांच मुख्य शर्तें याद दिलाई हैं। जानें क्या हैं वो और क्या ट्रंप मान जाएंगे?

अमेरिका ईरान युद्ध- India TV Hindi
अमेरिका ईरान युद्ध

ईरान और अमेरिका शांति समझौते के लिए तैयार हो गए हैं, लेकिन इसके लिए अमेरिका को ईरान की शर्तें माननी होंगी। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने प्रस्तावित समझौते के बारे में विस्तृत जानकारी दी है। उनका कहना है कि इस समझौते को कुछ ही दिनों में अंतिम रूप दिया जा सकता है। "इस्लामाबाद मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग" वाले इस समझौते के बारे में बात करते हुए अराघची ने कहा कि यह फ्रेमवर्क समझौता मौजूदा दोनों देशोिं के बीच जारी टकराव को खत्म करेगा, भविष्य की बातचीत का रास्ता साफ करेगा और साथ ही समुद्री सुरक्षा से लेकर प्रतिबंधों में ढील तक के मुद्दों को भी हल करेगा।

ईरान के विदेश मंत्री ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अभी तक अमेरिका और ईरान के बीच किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं, उन्होंने अमेरिका के सामने फिर से अपने अहम प्रावधानों का ज़िक्र किया जो उनके अनुसार इस समझौते का आधार बनेंगे। 

जानें क्या हैं ईरान की  शर्तें

  • ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने ट्रंप को अपनी शर्तें याद दिलाई हैं, उन्होंने कहा कि ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित समझौता एक व्यापक राजनयिक प्रक्रिया का पहला चरण मात्र है। उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य की बातचीत इसके सफल कार्यान्वयन पर निर्भर करेंगी। उनके अनुसार, ईरान और अमेरिका तेहरान के परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा को वार्ता के दूसरे चरण तक स्थगित करने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने कहा, "मुझे यह बताना चाहिए कि ये बातचीत, जिनसे युद्ध खत्म होगा, दो चरणों में होगी।"

     

  • अराघची ने  बताया परमाणु समझौते को पहले चरण के मेमोरेंडम में शामिल किया गया, जबकि परमाणु से जुड़े ज़्यादा मुश्किल मुद्दों पर बातचीत को दूसरे चरण के लिए टाल दिया गया है, जिसके 60 दिनों तक चलने की उम्मीद है। उनकी बातों से लगता है कि अगर शुरुआती समझौता ठीक से लागू नहीं हुआ, तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत शायद कभी शुरू ही न हो पाए।
     
  • ईरान की अहम शर्त ये है कि होर्मुज़ में युद्ध से पहले वाली स्थिति बहाल नहीं होगी, यह साफ़ संदेश है कि रणनीतिक रूप से अहम होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में हालात वैसे नहीं होंगे जैसे युद्ध से पहले थे। बता दें कि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल की सप्लाई इसी जलमार्ग से होती है और युद्ध के दौरान यह इलाका तनाव का केंद्र बना रहा है। अराघची ने मेमोरेंडम की मुख्य बातों का ज़िक्र करते हुए कहा, "इसमें होर्मुज़ से जुड़े मामले और समुद्री पाबंदियों को हटाने जैसी बातें भी शामिल हैं।" 
     
  • ईरान का कहना है कि होर्मुज़ पर उसकी संप्रभुता का सम्मान किया जाना चाहिए। अराघची ने बातचीत के दौरान बार-बार संप्रभुता के महत्व पर ज़ोर दिया और इसे प्रस्तावित समझौते के सबसे अहम हिस्सों में से एक बताया। उन्होंने कहा, "मेरा मानना ​​है कि यह पहली बार है जब 47 साल बाद, अमेरिका ने इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान की संप्रभुता के प्रति साफ़ तौर पर सम्मान ज़ाहिर किया है, और इसका ज़िक्र करते हुए इसे लिखित रूप में भी शामिल किया है।"
     
  • अरागची के मुताबिक, संप्रभुता के लिए आपसी सम्मान इस प्रस्तावित समझौते के आधारों में से एक है। उन्होंने कहा, "यह समझौता ईरान के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने का वादा करता है और हमसे भी उनके अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने का वादा करने को कहता है। यह पूरी तरह से बराबरी के आधार पर है।"
     
  • अराघची ने संकेत दिया कि किसी भी समझौते के बाद समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने में तेहरान सीधी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। ईरान ने संकेत दिया है कि संघर्ष खत्म करने और समुद्री प्रतिबंध हटाने से जुड़ी व्यवस्थाओं के तहत, वह होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले जहाज़ों के लिए सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा।
     
  • प्रस्तावित समझौते का एक और अहम हिस्सा ईरान की विदेशों में फंसी हुई संपत्ति से जुड़ा है। अराघची ने कहा कि बातचीत करने वालों ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए पहले ही एक तरीका तय कर लिया है। उन्होंने कहा, "ईरान के रुके हुए फंड का भी मुद्दा है, जिसके लिए एक तरीका तय किया गया है।" रुके हुए फंड को जारी करना लंबे समय से तेहरान की मुख्य मांग रही है और उम्मीद है कि यह प्रतिबंधों में ढील और आर्थिक पुनर्निर्माण पर होने वाली व्यापक बातचीत का हिस्सा होगा। इसके बाद बातचीत में पुनर्निर्माण और विकास के उपाय भी शामिल किए जाएंगे।

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